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THE CANCER CODE Book Summary in Hindi

 THE CANCER CODE Book Summary in Hindi - THE CANCER CODE - A Revolutionary Understanding of a Medical Mystery by Dr Jason Fung - Howdy Guys, आप आए दिन न्यूज़ में सुनते होंगे कि बीमारियाँ दिन-ब-दिन मज़बूत और जानलेवा होती जा रही हैं। खासकर, कैंसर के बारे में हम सभी जानते हैं। ये आज भी इतना जानलेवा कैसे बना हुआ है? ये किस वजह से होता है? क्या इसकी चपेट में आने के बाद बचने की उम्मीद की जा सकती है? ये समरी, आपको मेडिकल फील्ड के अब तक के सबसे बड़े रहस्यों में से एक को समझने में मदद करेगी। आइए, जानते हैं कि कैंसर के खिलाफ इस लड़ाई में इंसान कहाँ तक पहुंचा है।

ये समरी किसे पढ़नी चाहिए?

  • मेडिकल स्टूडेंट्स
  • जिन लोगों का वज़न बहुत ज़्यादा है
  • कैंसर पेशेंट्स के करीबी लोग

ऑथर के बारे में

जेसन फंग एक राइटर, नेफ्रोलॉजिस्ट और किडनी के एक्सपर्ट डॉक्टर हैं। फंग ‘पब्लिक हेल्थ कोलैबोरेशन’ नाम के नॉन-प्रॉफिट organization के डायरेक्टर भी हैं। वो बीच-बीच में intermittent फास्टिंग और लो-कार्ब, हाई फैट डाइट लेने पर ज़ोर देते हैं। फंग, ‘द डायबिटीज़ कोड’ और ‘द ओबेसिटी कोड’ के ऑथर भी हैं।

THE CANCER CODE Book Summary in Hindi

इंट्रोडक्शन

हमने कैंसर के इलाज के बारे में न्यूज़ पर देखा है और अपने दोस्तों या सोशल मीडिया से भी सुना है। ऐसे कई हॉस्पिटल और डॉक्टर्स हैं जो ऐसे नए हेल्थ प्रोग्राम को बढ़ावा देते हैं, जो ज़िंदगी को बेहतर बनाने का दावा करते हैं।

सच तो ये है कि इन प्रोग्राम्स से कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ता। आमतौर पर, ये वही पुराने प्रोग्राम होते हैं जिन्हें रीसायकल करके एक नया नाम दे दिया जाता है। इन्हें प्रमोट सिर्फ इसलिए किया जाता है क्योंकि इसके पीछे पॉलिटिक्स और पर्सनल या स्वार्थी कारण होते हैं। ये प्रॉब्लम हर फील्ड में है। ऐसी ही कुछ कहानी मोटापे, डायबिटीज़ और खासकर कैंसर में भी देखी गई है।

कैंसर को ठीक करने की कई कोशिशें की गई हैं, लेकिन कैंसर से होने वाली मौत फिर भी बढ़ती ही जा रही है। कैंसर एक खतरनाक बीमारी है, लेकिन असल में ये है क्या?

ये समरी आपको बताएगी कि कैंसर आखिर शुरू कहाँ से हुआ। क्या ये जेनेटिक म्युटेशन की वजह से हुआ या फिर ये एक इन्फेक्शन या ऑटोइम्यून बीमारी है? इसके साथ ही आप ये जानेंगे कि किसी इंसान के सेल में कैंसर की शुरुआत कैसे होती है और ये ट्यूमर में कैसे बदल जाता है। यानी कि आप कैंसर से जुड़ी हर बात के बारे में जानेंगे।

What is Cancer?

कैंसर का नाम सुनते ही मन बड़ा ख़राब सा हो जाता है। आज भी ये एक खतरनाक और जानलेवा बीमारी बनी हुई है। स्मॉल पॉक्स जैसी दूसरी बीमारियाँ, जो किसी ज़माने में घातक हुआ करती थीं, अब उनका इलाज किया जा सकता है, लेकिन यही बात आप कैंसर के लिए नहीं कह सकते। आज भी, इसे हराने का कोई सही रास्ता नहीं निकल पाया है। लेकिन कैंसर की शुरुआत हुई कैसे?

कैंसर का ज़िक्र सबसे पहले इम्होटेप की मेडिकल टीचिंग में पाया गया था। वो 2625 BC के दौर में एक इजिप्शियन फिज़िशियन यानी डॉक्टर थे। इम्होटेप ने कैंसर को, ब्रेस्ट में एक गाँठ के तौर पर बताया था जो ठंडा और सख्त था। इम्होटेप ने लिखा था कि इस गाँठ को ठीक करने का कोई इलाज नहीं था।

440 BC के आसपास, ग्रीक्स ने पर्शिया की रानी के ब्रेस्ट में भी एक गाँठ देखी। पेरू में, mummy बनाए गए शवों में, बोन ट्यूमर देखा गया था।

जब से इंसान इस दुनिया में आया है, कैंसर भी तभी से इस दुनिया में है। शुरुआती सिविलाइज़ेशन में, इसे नोटिस ना करने की एक वजह ये थी कि उस वक़्त लोगों की मौत कम उम्र में हो जाया करती थी। हमारे पूर्वज, अकाल और दूसरी बीमारियों की चपेट में आ जाया करते थे।

लेकिन, आज लाइफ की quality बहुत बेहतर हो गई है। कई मेडिकल ट्रीटमेंट आ गए हैं जिनसे लाखों लोगों की जान बचाई गई है। जानलेवा बीमारियों से अब बचा जा सकता है, लेकिन इसके बावजूद कई लोग कैंसर की चपेट में आ रहे हैं।

कैंसर कोई एक बीमारी नहीं है बल्कि ये कई बीमारियों को मिलाकर बनता है, जिनमें कुछ ख़ास quality या लक्षण होते हैं। इनके बारे में हम आगे बात करेंगे। इस बात पर ध्यान देना ज़रूरी है कि इंसान की बॉडी के हर सेल में कैंसर होने की संभावना होती है। किसी भी जीव के शरीर में सेल सबसे बेसिक यूनिट होता है।

ज़्यादातर कैंसर - लंग्स, ब्रेस्ट, प्रोस्टेट और स्किन जैसे ऑर्गन में पाए जाते हैं। ल्यूकेमिया, माईलोमा और लिम्फोमा जैसे ब्लड कैंसर भी पाए गए हैं।

स्पेसिफिक quality के बारे में बात करें तो कैंसर के रिसर्चर्स डग हानाहन और रॉबर्ट वीनबर्ग ने, “द हॉलमार्क ऑफ़ कैंसर” की शुरुआत की थी। ये सन 2000 में पब्लिश की गई उनकी बुक का नाम भी था। कैंसर सौ तरह के हो सकते हैं, लेकिन उन सभी में ऐसी 8 चीज़ें हैं जो एक जैसी हैं -

पहला हॉलमार्क है, “sustaining proliferative signalling”। इसका मतलब है कि कैंसर सेल्स बढ़ते रहते हैं। लेकिन, नॉर्मल सेल्स कभी बढ़ते नहीं हैं।

हमारी बॉडी में करोड़ों सेल्स होते हैं। हमारे सेल्स, बचपन में या फिर यंग ऐज में ही बढ़ते हैं। पुराने सेल्स मर जाते हैं और उनकी जगह नए सेल्स बन जाते हैं। जब इंसान, एक एडल्ट बन जाता है तब उसके सेल्स बनना बंद हो जाते हैं। लेकिन कैंसर सेल्स बढ़ते रहते हैं। ऐसा होने से ट्यूमर नाम का एक एबनॉर्मल सेल्स का ग्रुप बन जाता है। लेकिन ये होता क्यों है?

एक बात आपको बता दें कि जींस, सेल के ग्रोथ को कंट्रोल करते हैं। इस प्रोसेस में, दो जींस शामिल हैं - पहला जीन है, प्रोटो-ओंकोजींस, जो सेल के ग्रोथ को बढ़ाता है। ये कार के एक्सेलरेटर पर पैर रखने की तरह है।

दूसरे जीन को ट्यूमर सप्रेसर जीन कहते हैं, जो सेल के ग्रोथ को कम करता है। ये कार के एक्सेलरेटर से पैर हटाने की तरह है।

एक दूसरे को बैलेंस करने के लिए, ये दोनों जींस साथ मिलकर काम करते हैं। एबनॉर्मल सेल ग्रोथ, दो सिचुएशन में हो सकती है -

  • पहला तब, जब प्रोटो-ओंकोजींस ज़रुरत से ज़्यादा एक्टिवेटेड रहते हैं।
  • दूसरी सिचुएशन तब होती है जब, ट्यूमर सप्रेसर्स डीएक्टिवेट हो जाते हैं।

कैंसर का दूसरा हॉलमार्क है, “evading growth suppressors”। ये, पहले हॉलमार्क जैसा है। जींस, सेल्स के ग्रोथ को रोकने में मदद करते हैं। अगर जींस ठीक से काम नहीं करते हैं या उनमें कोई ख़राबी आ जाती है तो कैंसर develop होने लगता है।

तीसरा हॉलमार्क है, “resisting cell death”। समय के साथ, सेल्स पुराने हो जाते हैं, फिर मर जाते हैं और उनकी जगह नए सेल्स बन जाते हैं। ये ह्यूमन बॉडी का एक ऐसा पहलू है जिसे आप रोक नहीं सकते। सेल्स के मरने के प्रोसेस को, ‘एपॉपटौसिस’ ( apoptosis) कहते हैं।

अब, रेड ब्लड सेल्स का ही example ले लीजिए। इनकी एवरेज लाइफ स्पैन, तीन महीने की होती है। हर तीन महीने में, रेड ब्लड सेल्स एपोप्टोसिस के प्रोसेस से गुज़रते हैं। मरे हुए रेड ब्लड सेल्स की जगह तुरंत नए सेल्स बन जाते हैं।

ये प्रोसेस, आपकी कार के इंजन में तेल बदलने की तरह है। पहले, आपको पुराना तेल निकालना होता है ताकि आप इसमें नया तेल डाल सकें। एपोप्टोसिस का प्रोसेस भी ऐसे ही होता है। पुराने सेल्स मर जाते हैं और जीव में दोबारा जान डालने के लिए, इनकी जगह नए सेल्स बन जाते हैं।

कैंसर सेल्स , एपोप्टोसिस के नेचुरल प्रोसेस को resist करते हैं या उसके ख़िलाफ़ जाते हैं। वो मरते नहीं हैं। इसी वजह से, इंसान की बॉडी में सेल्स इतने ज़्यादा बढ़ जाते हैं कि ये आखिर में जाकर ट्यूमर बन जाता है।

कैंसर का चौथा हॉलमार्क है, “enabling replicative immortality”। साफ़-साफ कहें तो, सेल्स में खुद को बढ़ाने की ताकत होती है। सेल्स को उन फाइल्स की तरह सोचिए, जिन्हें आप अपने कंप्यूटर में कॉपी करके पेस्ट करते हैं।

लियोनार्ड हेफ्लिक नाम के साइंटिस्ट ने ये साबित किया था कि सेल्स सिर्फ एक लिमिटेड नंबर तक ही बढ़ सकते हैं, मतलब सिर्फ चालीस से सत्तर बार तक। हेफ्लिक ने अपनी रिसर्च, पेनसिलवेनिया यूनिवर्सिटी में की थी।

उन्होंने कहा था कि ये बात सच नहीं है कि सेल्स खुद को जितना चाहें उतना बढ़ा सकते हैं। सेल्स खुद-ब-खुद रुकने से पहले कितना भी बढ़ सकते हैं उसके बाद एपोप्टोसिस नाम का सेल के मरने का प्रोसेस शुरू हो जाता है। ये कैंसर सेल्स को बढ़ने से रोकने का एक तरीका है। लेकिन बदकिस्मती से, कैंसर सेल्स कभी नहीं मरते। एक बार बनने के बाद तो वो खुद को कितना भी बढ़ा सकते हैं।

पांचवा हॉलमार्क है, “inducing angiogenesis”। एंजियोजेनेसिस, नए ब्लड वेसेल्स बनाने का प्रोसेस है। ब्लड वेसेल्स बॉडी को, ऑक्सीजन और nutrients का फ्रेश सप्लाई देते हैं और बॉडी से गंदगी को बाहर निकालते हैं।

लेकिन जब ट्यूमर बढ़ता है तो क्या होता है? कैंसर सेल्स को नए ब्लड वेसेल्स की ज़रुरत होती है इसलिए नए मसल सेल्स और टिश्यू जैसी चीज़ों के ग्रोथ की भी ज़रुरत होती है। इसका मतलब ये है कि ट्यूमर के ग्रोथ को जगह देने के लिए, ब्लड वेसेल्स अपनी branches बनाती हैं।

छठा हॉलमार्क है, “activating invasion and metastasis”। दूसरे टिश्यूज़ में घुसने की एबिलिटी को ‘मेटास्टेसिस’ कहा जाता है और यही चीज़ कैंसर को इतना घातक बनाती है। कैंसर से होने वाली 90% मौतें, मेटास्टेसिस की वजह से होती हैं। अगर ट्यूमर, मेटास्टासाइज़ नहीं कर पाते तो इसे बिनाइन कहा जाता है यानी जो घातक या गंभीर नहीं होता है। बिनाइन कैंसर को, ठीक किया जा सकता है।

मेटास्टेसिस प्रोसेस में कई complicated स्टेप्स होते हैं। मेटास्टेटिक कैंसर सेल , अपनी जगह से हट जाते हैं। याद रखिए, कि इंसान का शरीर एक ऐसा सिस्टम है, जिसमें हर चीज़ की अपनी जगह होती है। जैसे, ब्रेस्ट के सेल्स, लंग्स या ब्रेन की तरफ नहीं जाते। जैसे ही कैंसर सेल अपनी जगह से हट जाते हैं तो वो खून में पहुँच जाते हैं। वो एक जगह ढूँढते हैं जहाँ वो मेटास्टासाइज़ कर सकते हैं और दूसरे टिश्यूज़ में घुस सकते हैं।

सातवाँ हॉलमार्क है, “deregulating cellular energetics”। बॉडी को चलाने के लिए, सेल्स को एनर्जी की ज़रुरत होती है। हम जो खाना खाते हैं उससे ग्लूकोस मिलता है जिससे आपको एनर्जी मिलती है। एनर्जी के लिए ग्लूकोस का इस्तेमाल दो तरह से किया जाता है -

  • पहला तरीका है, aerobic respiration। इसका मतलब है ऑक्सीजन की मदद से ग्लूकोस को बदलना।
  • दूसरा तरीका है, anaerobic fermentation। इसका मतलब है बिना ऑक्सीजन के ग्लूकोस को बदलना।

कैंसर सेल्स , anaerobic fermentation का इस्तेमाल करते हैं। वो एनर्जी के लिए, नॉर्मल सेल्स के मुकाबले, कहीं ज़्यादा ग्लूकोस खाते हैं।

कैंसर का आठवाँ हॉलमार्क है, “evading immune destruction”। शरीर का इम्यून सिस्टम, आपको किसी भी बीमारी से बचाने की कोशिश करता है। जब फॉरेन बॉडी आपके लंग्स में जाती हैं, तो आप खांसते और छींकते हैं और इस तरह ये फॉरेन बॉडी, आपकी बॉडी से बाहर निकल जाती हैं। इम्यून सिस्टम, बैक्टीरिया और वायरस जैसे घुसपैठियों पर लगातार नज़र रखता है। कैंसर सेल्स इसलिए बच जाते हैं क्योंकि ये इम्यून सिस्टम को धोखा दे देते हैं।

The Somatic Mutation Theory

हेरेडिटी, आपको जींस से मिलती है। इसलिए, आपकी आँखों का रंग, आपकी माँ से मिलता है या आपके बालों का रंग आपके पिता जैसा होता है। जींस, डीऑक्सीराइबोन्यूक्लिक एसिड यानी DNA ( deoxyribonucleic acid) से बने होते हैं। DNA से, क्रोमोसोम बनते हैं। इसी वजह से, आपकी आदतें अपने पेरेंट्स जैसी होती हैं।

1902 में, जर्मन बायोलॉजिस्ट थियोडोर बोवेरी ने, sea urchin के अंडों को स्टडी किया। उन्होंने देखा कि sea urchin के क्रोमोसोम बहुत ही तेज़ी से बढ़ रहे थे। ये बात आपको याद होगी कि इंसानों में भी कैंसर सेल्स ऐसे ही बढ़ते हैं: ये सेल्स कभी बढ़ना बंद नहीं करते।

बोवेरी ने अंदाज़ा लगाया कि क्रोमोसोम के अंदर कुछ ख़ास जींस, इस ग्रोथ को बढ़ाते हैं। इस हद से ज़्यादा ग्रोथ के कारण उन जींस में म्युटेशन यानी बदलाव होता है। सालों बाद, बोवेरी की थ्योरी सच साबित हुई। ओंकोजींस, सेल्स के ग्रोथ को बढाते हैं। दूसरी तरफ, ट्यूमर सप्रेसर जींस, सेल्स के की ग्रोथ को रोकते हैं। इस बैलेंस की वजह से सेल्स नॉर्मली काम कर पाते हैं।

ज़्यादातर कैंसर में, ओंकोजींस और ट्यूमर सप्रेसर जींस, दोनों में ही बदलाव होता है. ये सेल्स बढ़ते रहते हैं और आखिर में ट्यूमर बन जाते हैं। ट्यूमर सप्रेसर जींस भी इन कैंसर सेल्स को बढ़ने से नहीं रोकते हैं। इसे ‘सोमेटिक म्यूटेशन थ्योरी’, यानी SMT कहते हैं।

SMT के अनुसार, कैंसर का मतलब है जेनेटिक म्यूटेशन का इकट्ठा हो जाना। स्पर्म सेल्स और egg सेल्स को छोड़कर, बाकी सभी सेल्स को ‘सोमेटिक सेल्स’ कहते हैं। इसलिए, कॉन्सेप्ट के नाम से आप समझ सकते हैं कि म्यूटेशन, आपकी बॉडी के किसी भी सेल में हो सकता है।

एक अकेले इनहेरिटेड (पेरेंट्स से मिला हुआ) जेनेटिक म्यूटेशन के कारण एक जीन में ट्यूमर में बदलने का पोटेंशियल होता है। जैसे, एक इंसान में अपने पेरेंट्स से रेटिनोब्लास्टोमा ट्यूमर सप्रेसर जीन नाम का एक जेनेटिक म्यूटेशन आता है। इससे इंसान को आँख का ऐसा कैंसर हो सकता है, जो बहुत कम देखा गया है।

दूसरा example है, एक इनहेरिटेड वॉन हिप्पेल-लिंडौ ट्यूमर सप्रेसर जीन ( von Hippel-Lindau tumour suppressor gene)। इससे किडनी का कैंसर होने का खतरा बढ़ जाता है।

ब्रेस्ट कैंसर में, जो जींस ज़्यादातर कैंसर में बदल सकते हैं, वो हैं BRCA1। ब्रेस्ट कैंसर के 5% केस, इसी जींस की वजह से होते हैं। इस इनहेरिटेड जेनेटिक म्यूटेशन का परसेंटेज कम है। लेकिन, भले ही ये कितना भी कम हो, कैंसर डेवलपमेंट में इसका कहीं ना कहीं हाथ ज़रूर होता है।

जेनेटिक म्यूटेशन के अलावा, और किस वजह से कैंसर हो सकता है? दूसरी वजहों में, कुछ केमिकल्स, रेडिएशन और वायरस के contact में आना शामिल है।

आपको याद होगा कि एक इनहेरिटेड जेनेटिक म्यूटेशन भी ट्यूमर बन सकता है। लेकिन, इसके चांसेस बहुत कम हैं कि एक अकेला म्यूटेशन, नॉर्मल सेल्स को कैंसर सेल्स बना दे। तो, ऐसा क्या होता है जो एक नॉर्मल सेल को एक कैंसर सेल में बदल देता है?

जब DNA में कोई डैमेज होता है, तो एक नॉर्मल सेल आमतौर पर एक डिफेंस mechanism को अप्लाई करता है। लेकिन, ये तभी रिपेयर हो सकता है जब डैमेज कम हो। अगर DNA पूरी तरह से डैमेज हो जाता है, तो सेल उसे ठीक नहीं कर सकता। जेनेटिक म्यूटेशंस के होने के लिए, एक damaged DNA से बेहतर कोई जगह नहीं हो सकती। यहीं से कैंसर बनना शुरू होता है।

ज़्यादातर कैंसर में, मल्टीप्ल जेनेटिक म्यूटेशंस का होना ज़रूरी होता है। जेनेटिक म्यूटेशन होने में ये फैक्टर्स भी योगदान देते हैं: एस्बेस्टस (एस्बेस्टस एक रेशेदार पदार्थ है जो मिट्टी और चट्टानों में मौजूद होता है), tobacco यानी तंबाकू का धुआं, वायरस, बैक्टीरिया और रेडिएशन। अब चूहों को ही ले लीजिए। साइंटिस्ट्स, चूहों को केमिकल कार्सिनोजेन (कैंसर पैदा करने वाले तत्व) के contact में लेकर आए। जल्द ही, इन चूहों के ओंकोजींस में म्यूटेशन यानी बदलाव होने लगे, जिस वजह से उन्हें स्किन कैंसर हो गया।

सोमेटिक म्यूटेशन थ्योरी में ये भी शामिल है कि किस वजह से नॉर्मल सेल्स कैंसर सेल्स में बदल जाते हैं। सबसे पहले, लंग्स या ब्रेस्ट के सेल्स जैसे नॉर्मल सोमेटिक सेल्स, के DNA में डैमेज होता है।

दूसरा, DNA इतना ज़्यादा डैमेज हो जाता है कि इसे रिपेयर नहीं किया जा सकता। इस वजह से, म्यूटेशन होने लगता है।

तीसरा, ये म्यूटेशन इनमें से किसी एक जींस में होते हैं: ओंकोजींस नाम के ग्रोथ कंट्रोल करने वाले जींस में या फिर ट्यूमर सप्रेसर जींस में। कैंसर बनने के रास्ते में ये एक ख़ास मोड़ होता है। लेकिन, इसका सिर्फ यही sign नहीं होता है। दूसरे हॉलमार्क्स पर भी ध्यान देना ज़रूरी है।

चौथा, दूसरे जींस में म्यूटेशन, समय के साथ होता रहता है। ये रैंडमली ही होता है। जब सभी हॉलमार्क्स मौजूद होते हैं, तो सेल, कैंसर में बदल जाते हैं।

The Seed and the Soil

कैंसर एक बीज की तरह होता है। ऐसा एक बार, सर्जन स्टीफन पैगेट ने कहा था। बीज कहीं भी बोए जा सकते हैं, लेकिन ये तभी बढ़ते हैं, जब मिट्टी, रौशनी, पानी जैसे दूसरे कंडीशन भी इनकी ग्रोथ में मदद करते हैं। इसलिए, कैंसर के सेल्स भी कुछ ख़ास कंडीशन में ही बढ़ सकते हैं।

अभी तक, कैंसर के रिसर्च सिर्फ़ ने जीन म्यूटेशन नाम के बीज पर ही फोकस किया है। सोमेटिक म्यूटेशन थ्योरी, इसका एक अच्छा example है। बदकिस्मती से, मिट्टी या फिर ऐसी कंडीशन, जो कैंसर को बढ़ने में मदद करती हैं, उन पर बहुत कम रिसर्च हुई है।

मिट्टी या फिर ऐसी कंडीशंस पर फोकस करने को ‘ एपिजेनेटिक्स ’ ( epigenetics) कहते हैं। ये एक ऐसी फील्ड है, जिसमें हम ये जानते हैं कि कोई एनवायरनमेंट किसी जीव के डीएनए को बदले बिना उसे कैसे बदल देता है। एपिजेनेटिक्स का मतलब है कि जींस कैसे हैं और वो बदलकर कैसे हो जाते हैं।

आइए, बीज और मिट्टी के तालमेल को, म्यूज़िक की तरह सोचते हैं। लिरिक्स, गाने के जींस या DNA की तरह काम करते हैं। ये एक ऐसी चीज़ है, जिसे आप बदल नहीं सकते। गिटार या पियानो जैसे इंस्ट्रूमेंट, मिट्टी या एपिजेनेटिक्स का काम करते हैं। ये ऐसी चीज़ है, जिसे आप बदल सकते हैं।

जींस कैसे सामने आते हैं, ये बात कई फैक्टर्स पर डिपेंड करता है। एक इंसान की डाइट और वो कितना एक्सरसाइज़ करता है जैसे एनवायरनमेंटल फैक्टर्स, इसके अच्छे example हैं। इसका मतलब क्या है? इसका मतलब है कि कैंसर होने का ताल्लुक सिर्फ जेनेटिक म्यूटेशन जैसे इंटरनल फैक्टर्स से नहीं है बल्कि दूसरा इम्पोर्टेन्ट फैक्टर है एक्सटर्नल फैक्टर जैसे इंसान के आसपास का एनवायरनमेंट।

2009 में, नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट (NCI) ने, एक चौंकाने वाला काम किया। इस organization ने कैंसर की इस लड़ाई में, दूसरे एक्सपर्ट्स की मदद मांगी। आमतौर पर, कैंसर बायोलॉजिस्ट्स या रिसर्चर्स को सबसे पहले बुलाया जाता है, लेकिन इसके बजाय NCI ने फिज़िसिस्ट्स और एस्ट्रोबायोलॉजिस्ट्स से मदद मांगी।

NCI ने ये कदम इसलिए उठाया क्योंकि उन्हीं एक्सपर्ट्स को बुलाने से वही पुराने रिज़ल्ट मिलते। कैंसर को समझने के लिए, एक नए नज़रिए की सख्त ज़रुरत थी। लेकिन बदकिस्मती से, मेडिकल फील्ड ने जो बरसों से फॉलो किया जा रहा था वही किया था।

अगर आप एक नया नज़रिया सामने लाएंगे तो मेडिकल फील्ड को इसे अपनाने में सालों लग जाएंगे। एक नया आईडिया सबसे पहले, सैकड़ों स्टडीज़ और एक्सपेरिमेंट्स से होकर गुज़रेगा। ऐसा करना ज़रूरी तो है, लेकिन ये प्रोग्रेस के स्पीड और प्रोग्रेस को स्लो भी कर देता है।

सेकंडहैंड स्मोक, इसका अच्छा example है। 1960 के दशक में, लोगों को ये शक हो चुका था कि सेकंडहैंड स्मोक, फर्स्टहैंड स्मोक जितना ही घातक है, लेकिन इसका कोई पुख्ता सबूत नहीं था। फर्स्ट हैंड स्मोक का मतलब है जो लोग सिगरेट पीते हैं उसके धुंए से होने वाला नुक्सान और सेकंड हैंड स्मोक का मतलब है जो लोग सिगरेट नहीं पीते लेकिन सिगरेट पीने वाले जो धुआं छोड़ते हैं उससे होने वाला नुक्सान.

सालों तक, रिसर्चर्स को ये साबित करना पड़ा कि सेकंडहैंड स्मोक का इंसान की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। 1980 के दशक में जाकर, स्ट्रिक्ट “नो स्मोकिंग” के रूल्स बनाए गए, ताकि स्मोकर्स की वजह से पब्लिक एरिया में दूसरे लोगों को कोई नुक्सान ना हो। इससे आप समझ सकते हैं कि मेडिकल इंडस्ट्री में बदलाव करने में कितना वक़्त लगता है।

इसलिए, हमें दूसरी फील्ड्स के एक्सपर्ट्स की बहुत ज़रुरत है। जैसे, फिज़िसिस्ट्स को नई थ्योरीज़ पसंद आती हैं क्योंकि हो सकता है कि ये नई थ्योरी, पुरानी थ्योरीज़ या मिस्ट्रीज़ से जुड़े सवालों का जवाब दे पाएँ।

मेडिकल फील्ड में इस शिफ्ट की वजह से, कैंसर को बिल्कुल ही अलग नज़रिए से देखा गया। नेशनल कैंसर इंस्टिट्यूट ने, डॉ पॉल डेवीज़ नाम के एक फिज़िसिस्ट को बुलाया। उनकी expertise कैंसर नहीं बल्कि एस्ट्रोबायोलॉजी में थी। लेकिन, कैंसर की बहुत कम नॉलेज होने की वजह से उन्हें सबसे बेसिक और इम्पोर्टेन्ट सवालों की तरफ वापस जाने के लिए मजबूर कर दिया: और वो था कि ‘कैंसर क्या है और ये क्यों होता है?’

The Origins of Life and the Origins of Cancer

धरती पर जीवन की शुरुआत करोड़ों साल पहले हुई थी। जीवन के रूप में सबसे पहले, एक सेल वाले organism यानी जीव ने जन्म लिया था। ये सेल्स इसलिए जिंदा रह पाए क्योंकि बहुत ज़्यादा मात्रा में nutrients मौजूद थे। लेकिन, क्योंकि वो सिर्फ खुद को पोषण दे सकते थे इसलिए उनके ख़त्म होने का खतरा भी मंडरा रहा था। इसका मतलब, वो खुद को बचा नहीं सकते थे।

इसलिए, जिंदा रहने के लिए, इन एक सेल वाले जीवों खुद को replicate यानी बढ़ाना शुरू किया। लाखों साल गुज़र गए और ये एक सेल वाले जीव अब समय के साथ ज़्यादा कॉम्प्लेक्स जीव में बदलने लगे। अब ये एक सेल वाले जीव, मल्टी सेलुलर यानी कई सेल वाले जीव बन गए। इसकी सबसे बड़ी वजह एवोलूशन था: जब सेल्स साथ मिलकर काम करते हैं तो किसी भी जीव के ज़िन्दा रहने की संभावना बहुत बढ़ जाती है। इंसान, मल्टीसेलुलर हैं और जानवर भी।

सिंगल- सेल और मल्टी सेलुलर जीवों में बहुत फर्क होता है। ये फर्क इनकी ग्रोथ, immortality, मूवमेंट और ग्लाइकोलाइसिस ( glycolysis) में होता है।

सिंगल- सेल organism, चाहे कुछ भी हो जाए, बढ़ते रहते हैं। ये उनका डिफ़ॉल्ट सेटिंग है। ब्रेड पर लगे फफूंद के बारे में सोचिए, वो बढ़ते ही जाते हैं। वो इसी तरह ज़िन्दा रहना जानते हैं।

दूसरी तरफ, मल्टीसेलुलर organisms में ओंकोजींस होते हैं, जो जीन के ग्रोथ और ट्यूमर सप्रेसर जींस को प्रमोट देते हैं। यानी सेल्स सही वक़्त और सही जगह में ही बनते हैं। वो organism के शरीर में ही, एक organization और सिस्टम्स को फॉलो करते हैं। इसलिए, लीवर आपके चहरे पर नहीं बन सकता है।

अगर immortality की बात करें, तो सिंगल सेल्स immortal होते हैं, मतलब इन्हें कोई नहीं मार सकता। वो खुद को लगातार और हमेशा के लिए बढ़ा सकते हैं। दूसरी तरफ, मल्टीसेलुलर organisms, एक वक़्त तक ही बढ़ सकते हैं। जब वो अपनी लिमिट तक पहुँच जाते हैं, वो एपोप्टोसिस के प्रोसेस से गुज़रते हैं, जहाँ सेल मर जाते हैं।

अगर मूवमेंट की बात करें, तो सिंगल सेल organisms जहाँ चाहे वहां जा सकते हैं। वो सबसे अच्छे एनवायरनमेंट में जाकर, वहीँ रुक जाते हैं। सिंगल सेल organisms, उस एनवायरनमेंट के सभी रिसोर्सेज़ को ख़त्म कर देते हैं।

दूसरी तरफ, मल्टीसेलुलर organisms ये ध्यान रखते हैं कि उनका हर सेल अपनी सही जगह पर रहे। सेल्स एक दूसरे से इंटरैक्ट करते हैं जिससे वो सही वक़्त पर सही जगह पर रह पाते हैं। जैसे, ऑक्सीजन के लिए सभी इम्पोर्टेन्ट ऑर्गन, लंग्स के सेल्स पर डिपेंडेंट रहते हैं।

ऐसा होने के लिए, जब लंग्स हर ऑर्गन को ऑक्सीजन देता है, तो उनका सही जगह पर होना बहुत ज़रूरी है। इसी तरह, लंग्स के सेल अपने आप ऑक्सीजन इकट्ठा करना बंद नहीं कर सकता। मल्टीसेलुलर organisms के सभी सेल्स आपस में तालमेल बनाए रखते हैं, ताकि वो सभी जिंदा रह सकें।

सिंगल सेल और मल्टीसेलुलर organisms को अलग करने वाला एक आखिरी फैक्टर है, ग्लाइकोलाइसिस। ग्लाइकोलाइसिस का मतलब है, एनर्जी को बदलना। सिंगल सेल organisms को, एनर्जी को बदलने के लिए ऑक्सीजन की ज़रुरत नहीं होती। लेकिन, मल्टीसेलुलर organisms को, ग्लूकोस को एनर्जी में बदलने के लिए ऑक्सीजन की ज़रुरत होती है।

सिंगल सेल organisms, लगातार बढ़ते रहते हैं, कभी नहीं मरते, जहाँ चाहे वहाँ जा सकते हैं और ग्लाइकोलाइसिस में ऑक्सीजन का इस्तेमाल नहीं करते। ये सभी कैंसर के हॉलमार्क्स हैं. इसलिए, एक कैंसर सेल में, सिंगल सेल organisms से मिलती-जुलती कई चीज़ें होती हैं। लेकिन, ये information हमारे किस काम की?

अब, हम ये जानते हैं कि कैंसर क्या है और ये बॉडी में कैसे बनता है। अगली ज़रूरी चीज़ जो हमें जाननी है, वो है कैंसर से जुड़े रिस्क फैक्टर्स के बारे में।

इस बीमारी को बढ़ाने वाला सबसे बड़ा फैक्टर है, स्मोकिंग। जब आप स्मोक करते हैं, तो कई हानिकारक chemicals आपकी साँस के साथ शरीर के अंदर जाते हैं। कैंसर रिसर्च UK के मुताबिक, जब आप स्मोक करते हैं तो 5000 से ज़्यादा अलग-अलग chemicals आपके शरीर के अंदर जाते हैं।

ये हानिकारक chemicals बॉडी को नुक्सान पहुंचाते हैं, खासकर DNA को। जब DNA को नुक्सान पहुँचता है तो सेल का ग्रोथ कंट्रोल से बाहर चला जाता है। वो लगातार ग्रो करता जाता है, जो बिल्कुल नहीं होना चाहिए। अंत में, सेल का ग्रोथ कैंसर में बदल जाता है। स्मोकिंग से निकलने वाले chemicals से इम्यून सिस्टम भी कमज़ोर होता है। ये इम्यून सिस्टम को कैंसर सेल्स को ढूँढने और उन्हें ख़त्म करने से रोक देता है।

स्मोकिंग से सिर्फ लंग कैंसर ही नहीं होता बल्कि tobacco यानी तंबाकू के धुंए से लगातार होने वाली जलन से दिल की बीमारी और स्ट्रोक होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

दूसरा रिस्क फैक्टर है ओबेसिटी यानी मोटापा। 2013 में, पूरी दुनिया में 4.5 मिलियन लोगों की जान मोटापे की वजह से गई थी। लेकिन ऐसा क्यों होता है? क्योंकि मोटापा कई बीमारियों का कारण बनता है, जैसे कैंसर, डायबिटीज़, दिल की बीमारी और स्ट्रोक। रिसर्च ने ये साबित किया है कि ब्रेस्ट , लीवर और किडनी का कैंसर, मोटापे से जुड़ा हुआ है।

लेकिन, हमारा मॉडर्न लाइफस्टाइल, कई लोगों को मोटापे की तरफ ले जा रहा है। फ़ास्ट-फ़ूड रेस्टोरेंट्स में, बड़े-बड़े meal मिलते हैं। सुपरमार्केट हमें bulk में यानी ज़्यादा से ज़्यादा चीज़ें खरीदने के लिए बढ़ावा देते हैं। स्टडीज़ से पता चला है कि जिस रेट से कैंसर बढ़ रहा है वो बेहद चिंताजनक है।

तो अगर वज़न बढ़ने से कैंसर का खतरा बढ़ जाता है, तो क्या वज़न कम करने से खतरा कम हो सकता है? इस आईडिया पर हाल के सालों में कई स्टडी की गई हैं और इसका जवाब है, हाँ। वज़न कम करने से कैंसर होने का खतरा कम हो जाता है, ख़ासकर तब जब आप स्मोकिंग से भी दूर रहें।

अमेरिकन एसोसिएशन फॉर कैंसर रिसर्च ने चूहों पर एक स्टडी की थी। साइंटिस्ट्स ने चूहों के खाने में कार्बोहाइड्रेट की मात्रा को कम कर दिया था। इसके रिज़ल्ट से पता चला कि कम कार्बोहाइड्रेट लेने से चूहे कैंसर की चपेट में आने से बचे रहे थे। इसलिए, कम कैलरी लेने से कैंसर का ख़तरा कम हो सकता है।

Nutrition and Cancer

सर रिचर्ड डॉल, अपने समय के बड़े ही जाने-माने कैंसर एक्सपर्ट थे। दूसरी तरफ, सर रिचर्ड पीटो, ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी में मेडिकल स्टेटिस्टिक्स के प्रोफेसर थे। इन दो ब्रिल्लियन लोगों ने साथ मिलकर काम किया और कैंसर की जड़ के बारे में 117 पेज का एक डॉक्यूमेंट लिखा। डॉल और पीटो ने अंदाज़ा लगाया कि ये कारण 35 सालों से सच साबित हुए हैं।

डॉल और पीटो ने कैंसर की जड़ को इन हिस्सों में बांटा है: 35% कैंसर स्मोकिंग से होता है. अगर कैंसर डेवलपमेंट की बात करें, तो स्मोकिंग इसमें सबसे बड़ा फैक्टर है। फिर भी, हेल्थ रिस्क होने के बावजूद बहुत से लोग स्मोक करते हैं।

30%, आपकी डाइट की वजह से होता है। 20%, आपके काम से होने वाले खतरे से होता है, जैसे एस्बेस्टस के contact में आना। 10% वायरस जैसे इन्फेक्शन से होता है और 5% किसी और वजह से।

जब भी डाइट और कैंसर की बात आती है, तो इस बारे में कई अनुमान लगाए गए हैं। क्या ऐसा कोई डाइटरी फैक्टर है, जिससे कैंसर का खतरा बढ़ जाता है? क्या कोई ऐसा खाना है, जिसे खाने से कैंसर होने से रोका जा सकता है?

सबसे पहले, इस बात पर शक था कि डाइटरी फाइबर से कैंसर होता है। एक रिसर्च में, दो अलग-अलग लाइफस्टाइल्स को compare किया गया। एक ऐसा ट्रेडिशनल अफ्रीकन डाइट था जिसमें बहुत सा फाइबर था। फाइबर, स्टूल यानी मल को ठोस बना देता है जिससे बार-बार बाथरूम जाने की इच्छा होती है। दूसरी तरफ था, एक typical वेस्टर्न डाइट जिसमें कम फाइबर था, जिस वजह से उतनी बार बाथरूम नहीं जाना पड़ता था।

इस स्टडी ने 1973 में, आयरिश सर्जन, डेनिस बर्किट को एक थ्योरी बनाने में मदद की। क्योंकि फाइबर से आँतों में मूवमेंट ज़्यादा होता है तो ये कोलन कैंसर से बचा सकता है। इसका कारण है कि आँतों का लगातार मूवमेंट, intestine के पूरे सिस्टम को साफ़ करता है, जिससे खाना बॉडी में ज़्यादा वक़्त के लिए जमा नहीं रहता है।

बर्किट की थ्योरी में कुछ तो बात थी। लेकिन, फ्यूचर की स्टडीज़ ने इसे गलत साबित का दिया। 1999 की नर्सेज़ हेल्थ स्टडी ने, एक ऐसी रिसर्च की जो 16 साल चली। इसमें 16,000 औरतें थीं, जिन्हें हाई फाइबर डाइट दिया गया था। इन औरतों की आँतों की मूवमेंट अच्छी थी। लेकिन, फाइबर ने, इनमें कैंसर के खतरे को कम नहीं किया। हाई फाइबर डाइट होने के बावजूद, कैंसर के सेल्स फिर भी develop हुए थे।

लेकिन, डाइटरी फैट का क्या? फैट, इंसान की डाइट में शुरुआत से ही रहा है। ये मीट, dairy प्रोडक्ट्स और कोकोनट और ओलिव ऑइल जैसे तेल से मिलता है। अगर हम फैट को इतने लंबे समय से खा रहे हैं, तो इससे कैंसर होने का खतरा कैसे हुआ?

सेकंड वर्ल्ड वॉर के बाद, हार्ट अटैक के केस एक दम से बढ़ने लगे, जिसकी वजह जानना बहुत ज़रूरी थी। एक्सपर्ट्स इस बात को समझ गए थे कि इसकी वजह मोटापा या एक्सरसाइज़ की कमी नहीं था। 1960 से 1990 तक, लोगों में सिगरेट पीने की लत बढ़ गई थी। ये डाइटरी प्रॉब्लम नहीं थी, जिससे हार्ट अटैक हो रहे थे बल्कि इसकी वजह, स्मोकिंग का ट्रेंड था।

स्मोक करना एक लाइफस्टाइल बन गया था। Tobacco कंपनियों ने इस बात को मानने से साफ़ इंकार कर दिया था कि उनके प्रोडक्ट से दिल की बीमारी और कैंसर होता है। उस वक़्त के दौरान, डॉक्टर भी एक दिन में एक पैकेट सिगरेट पी जाते थे और tobacco की कंपनियों को सपोर्ट करते थे। पॉलिटिशियन और सेलेब्रिटीज़ जैसे कई influential लोग भी, स्मोकिंग करते थे। इसलिए, आम इंसान भी, इस झूठ में विश्वास करने लगा।

अनगिनत स्टडीज़ की गईं लेकिन लोग फ़िर भी इस बात को मानने के लिए तैयार नहीं थे। इसका एक example है, 1991 में किया गया women’s हेल्थ इनिशिएटिव स्टडी। इसके रिसर्चर्स ने कहा कि फैट खतरनाक था। इससे वज़न बढ़ता था, हार्ट अटैक और ब्रेस्ट कैंसर भी होता था। 80 साल तक की गई इस स्टडी में, 50,000 औरतें शामिल थीं। इसमें एक ग्रुप को, उनका नॉर्मल डाइट लेने के लिए कहा गया। दूसरे ग्रुप को, अपने डाइटरी फैट को कम करने के लिए कहा गया।

तो आइए जानते हैं कि इसका रिज़ल्ट क्या रहा. जिस ग्रुप ने अपने नॉर्मल डाइट को फॉलो किया था उनमें कैंसर होने का खतरा नहीं बढ़ा था । लेकिन दूसरे ग्रुप का क्या? क्या कम डाइटरी फैट से कैंसर होने का रिस्क भी कम हो गया था? बिल्कुल नहीं। डाइट में फैट होने से, कैंसर develop नहीं हुआ था।

कैंसर किसी एक nutrient की वजह से नहीं होता है। ज़्यादा डाइटरी फाइबर या फैट खाने से कैंसर नहीं होता है। कैंसर के खतरे को बढ़ाने की वजह है, मोटापा।

मोटापा, दिल की बीमारी और कैंसर के ख़तरे को बढ़ाता है। 1982 में, कैंसर प्रिवेंशन स्टडी में ये देखा गया था। इस रिसर्च में 77000 participants थे। स्टडी की शुरुआत में, सभी participants हेल्दी थे और उनकी बॉडी में कैंसर के कोई sign यानी लक्षण नहीं थे।

2003 तक, participants को observe किया गया कि उनमें से कौन ज़िन्दा था और किसकी मौत हो चुकी थी और किस वजह से हुई थी। इसका नतीजा ये निकला: उनमें से ज़्यादातर participants मोटापे की वजह से मर गए थे। मोटापा, डायबिटीज़, दिल की बीमारी और स्ट्रोक का कारण बनता है। लेकिन सिर्फ इतना ही नहीं, मोटापे से कैंसर होने का खतरा भी बढ़ जाता है।

Cancer Prevention and Screening

कैंसर को हराना एक लंबा सफ़र है। लेकिन, हम कुछ ऐसी चीज़ों को निकालने में कामयाब हुए हैं, जिनसे कई जिंदगियां बची हैं। 1991 में, कैंसर से होने वाली मौतें पीक पर थीं। 2016 तक, कैंसर से होने वाली मौते 27% कम हो गईं थी। ये सुधार हुआ था, स्मोकिंग के खिलाफ गवर्नमेंट द्वारा उठाए गए सख्त कदम के कारण। इसके लिए टीवी पर ad और सोशल मीडिया पर, एंटी-स्मोकिंग कैंपेन भी चलाए गए।

कैंसर हो हराने का सबसे अच्छा रास्ता है, उससे बचे रहना। स्मोकिंग कम करने से कैंसर से होने वाली मौतें भी कम हो गईं थीं। सिगरेट के पैकेट पर warning देना भी एक क़ानून बन गया। इन सभी चीज़ों की वजह से, लंग कैंसर के केस कम होने लगे। यही नहीं, बल्कि, एंटी-स्मोकिंग रेगुलेशंस ने भी, दिल की बीमारी और स्ट्रोक के खतरे को कम करने में, काफी मदद की।

लंग कैंसर, सबसे घातक कैंसर है। दूसरे घातक कैंसर में, आदमियों में प्रोस्टेट कैंसर और औरतों में ब्रेस्ट कैंसर आता है। स्क्रीनिंग की मदद से, प्रोस्टेट और ब्रेस्ट कैंसर से बचा जा सकता है। कैंसर स्क्रीनिंग में, यूरिन, ब्लड, DNA और दूसरे टेस्ट आते हैं।

कैंसर का जल्दी पता लगने से इसे मेटास्टेसिस होने से रोका जा सकता है। मेटास्टासिस तब होता है, जब कैंसर का ट्यूमर पूरी बॉडी में फ़ैल जाता है। ये बात साबित हुई है कि जल्दी पता लगाने और ट्रीटमेंट से ब्रेस्ट और प्रोस्टेट कैंसर के मरीज़ों की ज़िंदगी को पांच साल तक बढ़ाया जा सकता है। इसमें 5 साल ज़्यादा जीने का रेट 90% से ज़्यादा देखा गया है.

कैंसर को शुरुआती stage में पहचानना ज़रूरी है। ऐसा इसलिए है क्योंकि अगर कैंसर मेटास्टेसाइज होना शुरू हो गया है तो इंसान के बचने का रेट 30% तक कम हो जाता है।

दूसरा कैंसर जो स्क्रीनिंग की मदद से शुरुआत में ही पता चल सकता है, वो है सर्वाइकल कैंसर। ये Pap smear की मदद से पहचाना जा सकता है। ह्यूमन पेपिलोमावायरस या HPV 70% सर्वाइकल कैंसर का कारण बनता है। ये एक ऐसी बीमारी है, जो sexual contact से भी ट्रांसमिट हो सकती है।

इसमें देखा गया है कि इन्फेक्शन होने के बाद, कई सालों तक cervix (uterus के निचले सिरे पर पतला रास्ता) से abnormal सेल्स निकलते रहते हैं। जब इनका निकलना बंद हो जाता है तब सर्विक्ससर्वाइकल कैंसर develop हो जाता है। 1928 में, gynaecologist डॉ जॉर्ज पपनिकोलाउ ने, एक cervix को एक छोटे से ब्रश से खुरच दिया था क्योंकि वो cervix के सेल्स को examine करना चाहते थे। माइक्रोस्कोप में उन्होंने इन सेल्स में कैंसर होने से पहले बनने वाले घाव देखे, जो बाद में कैंसर बन गया था।

1939 तक जॉर्ज न्यू यॉर्क हॉस्पिटल में एडमिट औरतों के cervix सेल्स की जांच कर रहे थे। 1941 में, उन्होंने एक पेपर बनाया, "Pap" smear, जो कैंसर होने से पहले होने वाले घावों का पता लगा सकता था । इस तरह, अगर इसका शुरुआत में ही पता लगा लिया जाए तो इन घावों को हटाने और उन्हें कैंसर सेल्स बनने से रोका जा सकता है।

Dietary Determinants of Cancer

कैंसर को लेकर एक बड़ा अजीब फैक्ट भी है। कभी-कभी, ये इंसान को बिल्कुल परेशान नहीं करता बल्कि ऑटोप्सी स्टडीज़ से ये पता चला है कि 30% आदमी ऐसे होते हैं जिन्हें 50 साल की उम्र तक प्रोस्टेट कैंसर होता है और जिसका पता ही नहीं चलता। कुछ लोगों को कैंसर होता है, लेकिन ये बीमारी उन्हें मारती नहीं बल्कि वो ज़िंदगी भर ऐसे ही जिंदा रहते हैं।

लेकिन, इसकी वजह क्या है? इसे आप एक इंसान के डाइट से जोड़ सकते हैं। जो भी nutrients, आप अपनी बॉडी को देते हैं, वो सेल के ग्रोथ से करीबी से जुड़ा हुआ है। बदकिस्मती से, इसी वजह से कैंसर के सेल्स बढ़ते हैं। इसलिए, जो भी आप खाते हैं उसका आपके हेल्थ पर गहरा असर पड़ता है। इसी वजह से डाइट या nutrition, कैंसर से जुड़ा दूसरा इम्पोर्टेन्ट फैक्टर है। पहला है, स्मोकिंग।

बदकिस्मती से, कैंसर से बचने के लिए, ऐसी कोई जादुई डाइट नहीं है। लेकिन, ऐसी कई प्रिवेंटिव डाइटरी स्ट्रेटेजीज़ हैं, जिससे आपको फ़ायदा हो सकता है -

पहला प्रिवेंशन है, वज़न कम करना। स्टडीज़ से पता चला है कि वज़न कम करने से कई हेल्थ बेनेफिट्स मिलते हैं। अगर आपका वज़न ज़्यादा है, तो इसे कम करने से कैंसर की वजह से मरने के खतरे को 40% से 50% तक कम किया जा सकता है।

Bariatric सर्जरी पर हुई कई स्टडीज़ भी अच्छी खबर लेकर आईं है। Bariatric सर्जरी में, पेट का एक हिस्सा निकाल दिया जाता है। ये पेट के साइज़ को कम कर देता है और इंसान कम खाना खा पाता है। Canada में, bariatric सर्जरी की मदद से वज़न कम करने से कैंसर से होने वाला खतरा 78% कम हो गया है। स्वीडन में, bariatric सर्जरी ने औरतों में कैंसर होने के खतरे को 42% तक कम कर दिया है।

लेकिन, bariatric सर्जरी के कुछ नुक्सान भी हैं। इससे पेट में होने वाले किसी नुक्सान या सूजन से, आपको कई बीमारियाँ हो सकती हैं।

दूसरा प्रिवेंशन है, फास्टिंग करना। फास्टिंग आपको मोटापे, टाइप 2 डायबिटीज़ और inflammation यानी शरीर में सूजन से बचाता है। ये वेट कम करने का अलग तरीका है। याद है ना आपको, मोटापा अलग-अलग बीमारियों का कारण बनता है, खासकर कैंसर का।

कीमोथेरेपी के दौरान फास्टिंग करने से, बेहतरीन रिज़ल्ट देखे गए हैं। इससे कीमोथेरेपी के साइड इफेक्ट्स, जैसे कि जी मचलाना या उल्टी आना, भी बहुत कम हो जाता है।

तीसरा है, कीमोप्रिवेंशन। इसका मतलब उस खाने, सप्लीमेंट्स या ड्रग्स से है, जिनमें कैंसर को बढ़ने से रोकने की ताकत है। कीमोप्रिवेंशन का एक अच्छा example है, मेटफॉर्मिन नाम की दवाई।

मेटफॉर्मिन में कैंसर के खतरे को 57% तक कम करने का पोटेंशियल है। लेकिन, ये ध्यान रखिए कि यहाँ जो वर्ड इस्तेमाल किया गया है वो है, “पोटेंशियल”। ये दवाई इस बात की पूरी गारंटी नहीं देती है कि अगर आप इसे लेंगे तो आपको कभी कैंसर नहीं होगा। मेटफॉर्मिन, कैंसर के सेल्स में ग्लूकोस को कम करके काम करता है।

अगर खाने की बात करें तो, तो ग्रीन टी, एक अच्छा कीमोप्रिवेंशन है। ग्रीन टी, में कैटेकिंस जैसे और भी कैमिकल कंपाउंड्स होते हैं, जो बॉडी में inflammation यानी सूजन को कम करते हैं। इसके अलावा, ग्रीन टी, ज़्यादा वज़न जैसे कैंसर के रिस्क फैक्टर्स को भी कम करता है।

Immunotherapy

अगर कैंसर की बात करें, तो इम्यूनोथेरेपी सबसे अच्छा डिफेंस है। इसमें आपको, सिर्फ अपने इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाना होता है।

1829 में, एक औरत के केस का example लेते हैं। लगभग दो सालों से वो ब्रेस्ट कैंसर से लड़ रही थी। वो कमज़ोर हो गई थी, पूरे दिन बिस्तर पर पड़ी रहती है और मरने के कगार पर थी। इसके अलावा, उसे तेज़ बुखार भी था। इस समय उसके ब्रेस्ट में, बहुत सूजन थी। इसलिए, डॉक्टर ने उसके ब्रेस्ट में कुछ चीरे लगाकर उसके अंदर बन रहे लिक्विड को निकाला। कुछ ही महीनों में, उसका कैंसर गायब हो गया।`

1867 में, एक और औरत की बात करते हैं। उसकी गर्दन में एक ऐसा ट्यूमर था, जो कभी ठीक नहीं हो सकता था। एक जर्मन डॉक्टर विल्हेम बश ने इसे कॉटराइज़ करने का फैसला लिया। कॉटराइज़ का मतलब है किसी गर्म इंस्ट्रूमेंट से स्किन को जला देना ताकि इन्फेक्शन को फ़ैलने से रोका जा सके।

बदकिस्मती से, इस औरत का बेड उस मरीज़ के बगल में था जिसे स्किन में इन्फेक्शन हुआ था । इस स्किन इन्फेक्शन का नाम था ‘एरीसिपेलस’। ये एक ऐसा इन्फेक्शन था जो आसानी से फ़ैल सकता था और बदकिस्मती से ये इन्फेक्शन उस औरत को भी हो गया। इस औरत को सिर्फ, एक लाइलाज ट्यूमर और स्किन में इन्फेक्शन ही नहीं था बल्कि उसे तेज़ बुखार भी था। लेकिन इस हादसे से कुछ हफ़्तों बाद, उस औरत का ट्यूमर छोटा होने लगा।

ये दो ऐसे example हैं, जिससे हमें ये समझ आता है कि हमारी बॉडी में कैंसर को ख़त्म करने की ताकत है। पिछले कुछ सालों में ऐसे कई केस देखे गए हैं, जिससे ये साबित होता है कि हमारी बॉडी में कैंसर से लड़ने की हिम्मत है।

डॉ जेम्स एलिसन, मॉडर्न इम्यूनोथेरेपी में एक्सपर्ट हैं। उन्होंने इस बात को स्टडी करने में सालों लगा दिए कि सेल्स , बैक्टीरिया और इन्फेक्शन जैसी फॉरेन बॉडीज़ पर कैसे अटैक करते हैं।

इंसान का इम्यून सिस्टम, कई सेल्स से बना होता है। डॉ एलिसन ने, T सेल्स पर फोकस किया। T सेल्स , बहुत जानलेवा होते हैं। उनमें बीमार और इन्फेक्टेड सेल्स को मारने की ताकत होती है। इतने डेडली होने की वजह से, बॉडी हर वक़्त इन T सेल्स को कंट्रोल करती है। इसका मतलब, T सेल्स इन बीमार और इन्फेक्टेड सेल्स को तुरंत नहीं मारते। “नॉर्मल” सेल्स और “बीमार और इन्फेक्टेड सेल्स ” को अलग करने का, इम्यून सिस्टम का अपना तरीका होता है।

T सेल्स को न्यूक्लियर मिसाइल की तरह सोचिए। इनमें चाबियाँ होती हैं ताकि न्यूक्लियर मिसाइल गलती से लॉन्च ना हो जाए। ऐसे ही T सेल्स की भी दो चाबियाँ हैं, जिन्हें बीमार और इन्फेक्टेड सेल्स को अटैक करने के लिए, एक्टिवेट करना पड़ता है।

पहली चाबी है, पॉज़िटिव कंट्रोल। ये, T सेल्स को अटैक करने के लिए कहता है। दूसरी चाबी है, नेगेटिव कंट्रोल यानि “किल स्विच”। एक गलत अलार्म मिलने पर ये चाबी, T सेल्स को अटैक करने से मना करती है।

डॉ एलिसन के रिसर्च शुरू करने से पहले, किसी को भी “किल स्विच” नाम की दूसरी चाबी के बारे में पता नहीं था। डॉ एलिसन ने ही इसकी खोज की थी। उन्होंने ही इम्यून सिस्टम में, रिसेप्टर्स को अच्छे से स्टडी किया। रिसेप्टर उसे मिलने वाले stimuli के हिसाब से, इम्यून सिस्टम में बदलाव करता है।

डॉ एलिसन ने CTLA-4 नाम के रिसेप्टर को स्टडी किया। पहले, CTLA-4 को T सेल एक्टिवेटर माना जाता था। लेकिन, डॉ एलिसन ने ये साबित कर दिया कि CTLA-4 तो असल में एक “किल स्विच” था।

अगर CTLA-4 नाम के इस किल स्विच को ट्रिगर नहीं किया जाता है, तो T सेल्स अटैक करेंगे। अगर CTLA-4 एक्टिवेटिड है, तो T सेल्स अटैक नहीं करेंगे। कैंसर सेल्स, किल स्विच की नक़ल करके T सेल्स को बेवकूफ बनाकर उनसे बच जाते हैं। इसलिए, T सेल्स के लिए उन्हें ख़त्म करना नामुमकिन था। तो, किल स्विच को हम बंद कैसे करें, ताकि T सेल्स कैंसर सेल्स को मार सके?

डॉ एलिसन ने एक दवाई बनाई थी जो CTLA-4 को ब्लॉक कर सकता था। उन्होंने इसे जानवरों पर test किया और इससे चौंकाने वाले रिजल्ट मिले। इससे जानवरों का ट्यूमर बिल्कुल पिघल गया था।

आज, इस दवाई को हम इपिलिमुमाब नाम की एंटीबॉडी के नाम से जानते हैं। डिपार्टमेंट ऑफ़ फ़ूड एंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन ने, इसे 2011 में मेटास्टेटिक मेलानोमा नाम के स्किन कैंसर के ट्रीटमेंट के लिए अप्रूव कर दिया। जिन मरीजों को ये एंटीबॉडी दिया गया था उनमें से 20% लोग अगले दस साल तक जिंदा रहे। ये इस बात का सबूत है कि कैंसर इम्यूनोथेरेपी मुमकिन है।

Conclusion

सबसे पहले, आपने कैंसर के डेफिनिशन को समझा। कैंसर कई बीमारियों का एक कलेक्शन है जिनमें कुछ खास गुण होते हैं जिन्हें कैंसर के हॉलमार्क या लक्षण कहा जाता है। कैंसर कई तरह का होता है। लेकिन, ऐसी 8 चीज़ें हैं, जो इन सभी में एक जैसी होती हैं।

दूसरा, आपने सोमेटिक म्यूटेशन थ्योरी के बारे में जाना। ये थ्योरी हमें बताती है कि कैंसर कैसे होता है। SMT बताता है कि जेनेटिक म्यूटेशन आखिर में एक साथ मिलकर ट्यूमर बनाते हैं। मल्टीप्ल जेनेटिक म्यूटेशन, जेनेटिक बदलाव और स्मोकिंग, वायरस और बैक्टीरिया जैसे दूसरे फैक्टर्स की वजह से होता है।

तीसरा, आपने सीखा कि कैंसर के पीछे का कारण सिर्फ जेनेटिक्स ही नहीं है। इस बात पर भी ध्यान देना ज़रूरी है कि इन जींस के साथ क्या होता है। इसका मतलब, एनवायरनमेंटल फैक्टर्स पर भी ध्यान देना चाहिए। कैंसर के पीछे सबसे बड़ा रिस्क फैक्टर है, स्मोकिंग। दूसरा है, मोटापा।

चौथा, आपने कैंसर की जड़ के बारे में जाना: 35% स्मोकिंग की वजह से होता है और 30% आपकी डाइट की वजह से। कैंसर, किसी nutrient या खाने की वजह से या उसकी कमी के कारण नहीं होता है बल्कि मोटापे से कैंसर होने का बहुत ज़्यादा रिस्क होता है।

पांचवा, आपने स्क्रीनिंग की मदद से कैंसर प्रिवेंशन के बारे में जाना। शुरुआत में ही स्क्रीनिंग की मदद से, प्रोस्टेट और ब्रेस्ट कैंसर को फ़ैलने से रोका जा सकता है। Pap smear के ज़रिए सर्वाइकल कैंसर को शुरुआत में ही पहचाना जा सकता है।

छठा, आपने कैंसर के पीछे के डाइटरी फैक्टर्स भी जाने। Bariatric सर्जरी और फास्टिंग जैसे वज़न कम करने के तरीके, काफी असरदार साबित हुए हैं। मेटफॉर्मिन जैसे कीमोप्रिवेंशन, कैंसर को 57% तक कम कर सकते हैं।

आखिर में, आपने इम्यूनोथेरेपी के बारे में जाना। इम्यूनोथेरेपी का मतलब है, अपने इम्यून सिस्टम को मज़बूत बनाना। हमारे पास CTLA-4 रिसेप्टर नाम का बेस्ट डिफेंस है। इसे बंद करके, हमारे T- सेल्स , कैंसर सेल्स पर अटैक कर सकते हैं। ऐसा हम इपिलीमुमाब नाम की दवाई से कर सकते हैं। मेटास्टैटिक मेलानोमा को ठीक करने के लिए, इसे FDA ने अप्रूव कर दिया है।

दशकों की रिसर्च के बावजूद आज भी कैंसर में ऐसे एलिमेंट्स मौजूद हैं जो अभी भी पहेली बने हुए हैं। लेकिन, नए नज़रिए और अलग-अलग एक्सपर्ट्स समय-समय पर कैंसर से लड़ने में मदद करते रहे हैं। भले ही कैंसर के ख़िलाफ़ की लड़ाई अभी और लंबी चलेगी, लेकिन विश्वास कीजिए कि हम इस बीमारी पर एक दिन काबू ज़रूर पा लेंगे। वो कहते हैं ना कि उम्मीद पर तो दुनिया कायम है तो हम भी उम्मीद करते हैं कि हम जल्द ही कैंसर को ठीक करने के और असरदार तरीके ढूँढ पाएँगे ताकि किसी को इस जानलेवा बीमारी से ना जूझना पड़े और कोई इस घातक बीमारी की वजह से किसी अपने को ना खोए।

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